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तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न पर विवाद, शिवसेना मामले से तुलना को लेकर उठे सवाल

Kavita2
18 Sept 2026 9:45 AM IST
तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न पर विवाद, शिवसेना मामले से तुलना को लेकर उठे सवाल
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नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद चर्चा में है। पार्टी के नाम और दो फूल वाले चुनाव चिह्न को लेकर उठे विवाद के बीच अंतरिम आदेश के तहत मुख्य नाम और चिह्न को फ्रीज किए जाने की बात सामने आई है। हालांकि, यह अंतिम फैसला नहीं है और आगे की प्रक्रिया के बाद स्थिति बदल भी सकती है।

मामले को लेकर राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं कि जब साल 2022 में शिवसेना के विभाजन के बाद चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट को पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न सौंप दिया था, तो तृणमूल कांग्रेस के मामले में प्रक्रिया अलग क्यों दिखाई दे रही है।

दरअसल, किसी राजनीतिक दल में टूट या नेतृत्व को लेकर विवाद होने पर चुनाव आयोग यह तय करता है कि पार्टी का आधिकारिक नाम और चुनाव चिह्न किस गुट को मिलेगा। इसके लिए आयोग संबंधित पक्षों के दावों, संगठनात्मक समर्थन और विधायकों-सांसदों के समर्थन जैसे पहलुओं पर विचार करता है।

शिवसेना विवाद में वर्ष 2022 में उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट के बीच पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद हुआ था। इसके बाद चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों के दावों की सुनवाई की थी। आयोग ने अपने फैसले में शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न आवंटित किया था।

वहीं, तृणमूल कांग्रेस से जुड़े मौजूदा विवाद में अभी स्थिति अंतरिम स्तर पर बताई जा रही है। नाम और चिह्न को लेकर अंतिम निर्णय आने तक मुख्य नाम और प्रतीक को फ्रीज रखने की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य विवाद के दौरान किसी एक पक्ष द्वारा मूल पहचान का इस्तेमाल करने से रोकना होता है।

राजनीतिक दलों के चुनाव चिह्न से जुड़े विवादों में चुनाव आयोग की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है। आयोग को यह तय करना होता है कि पार्टी की वास्तविक पहचान किस गुट के साथ है और किसे आधिकारिक मान्यता दी जाए।

तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से पश्चिम बंगाल की प्रमुख राजनीतिक पार्टी रही है। पार्टी की स्थापना ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर की थी और बाद में राज्य की राजनीति में इसका बड़ा प्रभाव बना। ऐसे में पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न से जुड़ा कोई भी विवाद राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।

वहीं, शिवसेना विवाद के बाद चुनाव आयोग के फैसले को लेकर भी राजनीतिक और कानूनी बहस हुई थी। अलग-अलग दलों ने इस तरह के मामलों में पार्टी संगठन, विधायकों की संख्या और नेतृत्व के अधिकार को लेकर अपने-अपने तर्क रखे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, हर राजनीतिक दल के विवाद की परिस्थितियां अलग होती हैं। चुनाव आयोग किसी एक पुराने मामले के आधार पर फैसला नहीं करता, बल्कि हर मामले में उपलब्ध दस्तावेजों और दावों की समीक्षा करता है।

तृणमूल कांग्रेस से जुड़े मामले में भी आगे की सुनवाई और प्रक्रिया के बाद ही अंतिम स्थिति स्पष्ट होगी। फिलहाल नाम और चुनाव चिह्न को लेकर जारी विवाद के कारण पार्टी की आधिकारिक पहचान को लेकर असमंजस बना हुआ है।

राजनीतिक दृष्टि से भी यह मामला अहम माना जा रहा है, क्योंकि चुनाव चिह्न किसी भी राजनीतिक दल की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। चुनावों में मतदाताओं तक पहुंच बनाने और पार्टी की पहचान बनाए रखने में इसका बड़ा महत्व होता है।

फिलहाल सभी की नजरें चुनाव आयोग की आगे की कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। अंतिम फैसला आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर आगे की स्थिति क्या होगी।

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